CG — हरेली से हरियाली तक धरती का आभार-भारतीय संस्कृति में प्रकृति, कृषि पशुधन ,वनस्पति,औषधीय वैद्य परंपरा और स्वत्व का सम्मान


विविधता में एकता कैसे पूरा देश एक ही दिन अलग-अलग नामों से मिट्टी और पौधों की पूजा करता है।भारत की पावन मातृभूमि पर त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला हैं। श्रावण मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला हरियाली पर्व (छत्तीसगढ़ में हरेली, उत्तराखंड में हरेला) इसी बात का जीवंत प्रमाण है। यह पर्व पर्यावरण के प्रति मानव समुदाय के गहरा आभार व्यक्त करने का दिन है।हरेली और हरियाली अमावस्या सनातन संस्कृति का वह महा-अनुष्ठान है, जो मनुष्य को प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना सिखाता है। यह पर्व देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, परंतु इसके पीछे निहित अध्यात्म, दर्शन और पर्यावरण संरक्षण का भाव सर्वत्र एक समान है। यह त्योहार एक ही समय पर प्रकृति के विभिन्न आयामों को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है:
छत्तीसगढ़ का प्रथम लोक-पर्व ‘हरेली’ न केवल कृषि और हरियाली का उत्सव है, बल्कि यह सनातन संस्कृति, प्रकृति और मानव समाज के अटूट संबंधों का जीवित प्रमाण है। सावन महीने की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह तिहार छत्तीसगढ़ की माटी की महक, लोक-विश्वासों, औषधीय ज्ञान और आर्थिक स्वावलंबन का एक अद्भुत कोलाज है।
*हरेली का सांस्कृतिक*
*ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व:*
*कृषि का महाअनुष्ठान:*
धान की बुवाई और बियासी (रोपाई) का कार्य संपन्न होने के बाद जब धरती हरी चुनरी ओढ़ लेती है, तब किसान प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
*ऐतिहासिक व मानवशास्त्रीय संदर्भ:*
यह पर्व छत्तीसगढ़ के जनजातीय और ग्रामीण समाज की जीवन शैली को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि मानव सभ्यता ने जब शिकार युग से कृषि युग में प्रवेश किया, तो उसने अपने सहायक पशुओं और औजारों को देवता का स्थान दिया।
*वैदिक ग्रंथों का आदर्श संदेश* (यजुर्वेद – 12.72):
*“औषधयः संवदन्ते सोमेन सह राजा*। *यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि॥*”
अर्थात: वनस्पतियाँ और औषधियाँ आपस में बात करती हैं कि वे मानव और पशुधन को सभी रोगों और नकारात्मक शक्तियों से मुक्त रखेंगी। हरेली इसी वैदिक सत्य का व्यावहारिक रूप है!
*कृषि उपकरणों व पशुधन का पूजन:*
श्रम के प्रति सम्मान
हरेली के दिन किसान अपने संगी-साथी और प्राण-स्वरूप कृषि औजारों को अच्छी तरह धोकर, नहलाकर पूजा स्थान पर रखते हैं।
पूजा के उपकरण: नागर (हल), कुदाड़ी (कुदाल), रापा (फावड़ा), गैंती, और दंतेली।
*पशुओं की पूजा व लोँदी खिलाना:*
खेतों में रात-दिन अनवरत परिश्रम करने वाले गाय, बैल और भैंसों को नहलाया जाता है। इस दिन आटे से बनी ‘लोँदी’ (गेहूं के आटे में रसनाजड़ी व नमक मिलाकर बनाई गई दवा युक्त गोलियां) पशुओं को खिलाई जाती है, ताकि वे साल भर स्वस्थ और ऊर्जावान रहें।
*तंत्र-मंत्र, जनश्रुतियाँ और अद्वितीय लोक-परंपराएँ:*
हरेली की रात को ‘तंत्र साधना’ और अनिष्ट शक्तियों से सुरक्षा के लिए एक विशेष समय माना जाता है। इस संदर्भ में ग्रामीण अंचलों में कई वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक हित निहित हैं:
*नीम की टहनी (मुख्य द्वार पर):*
हरेली के दिन सुबह घर के मुख्य द्वारों पर नीम की पत्तियाँ और टहनियाँ लगाई जाती हैं। नीम के पत्तों का लटकाना वातावरण को शुद्ध करता है और सावन के महीने में फैलने वाले संक्रामक जीवाणुओं को घर में प्रवेश करने से रोकता है।
*भेलवा की काड़ी (खेतों में):* किसान अपने खेतों में भेलवा पेड़ की टहनियाँ गाड़ते हैं। भेलवा में प्राकृतिक रूप से ऐसे तत्व होते हैं जो धान की फसल को हानिकारक कीटों और महामारियों से बचाते हैं。
*नमक और कोयला पकड़कर सोना:*
मान्यता है कि रात को सोने से पहले हाथ में नमक और कोयला रखने से शरीर की नकारात्मक ऊर्जा और बुरे सपने दूर होते हैं।
*लहसुन की काड़ी से आंकना:*
घर की चौखट और अनाज रखने के कोठार के चारों ओर लहसुन के रस या काड़ी से रेखा (लकीर) खींची जाती है। लहसुन की तीव्र गंध जहरीले कीड़े-मकोड़ों, बिच्छू और सांपों को घर के भीतर आने से रोकती है।
*छत्तीसगढ़ की पारंपरिक ‘गेड़ी’ और खेल:*
हरेली का सबसे रोमांचक हिस्सा ‘गेड़ी’ (बांस के डंडे पर बनाए गए पैर टिकाने के स्थान) पर चढ़ना है। बच्चे से लेकर युवा तक गेड़ी पर तेजी से चलने और दौड़ने का आनंद लेते हैं।
*वैज्ञानिक कारण:*
वर्षा ऋतु में हर तरफ पानी, कीचड़ और जहरीले जीव होते हैं। गेड़ी पर चलने से पैर जमीन के सीधे संपर्क में नहीं आते, जिससे पैर सुरक्षित रहते हैं और शरीर का संतुलन व शारीरिक क्षमता मजबूत होती है।
बहु-आयामी दृष्टिकोण: हरेली का वैज्ञानिक व औषधीय दर्शन
दृष्टिकोण समाज और जीवन पर इसका निहितार्थ
*औषधीय व वैद्य परंपरा:*
इस दिन बैगा,पंचमी वैद्य, (पारंपरिक चिकित्सक) जंगल से जड़ी-बूटियाँ लाते हैं और अपने शिष्यों को वनौषधियों का ज्ञान देते हैं। यह प्राचीन भारतीय ‘आयुर्वेद’ और लोक-चिकित्सा का संरक्षण है।
*मनोवैज्ञानिक लाभ:*
सावन की अमावस्या के घने अंधकार के भय को दूर करने और परिवार में सुरक्षा की भावना लाने के लिए किए जाने वाले टोटके (जैसे नमक-कोयला) अवचेतन मन को सकारात्मक ऊर्जा देते हैं।
आर्थिक स्वावलंबन पशुओं और कृषि औजारों का सही रखरखाव किसान के खर्च को कम करता है। अच्छी फसल की नींव हरेली से ही रखी जाती है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करती है।
दार्शनिक अर्थ गीता के कर्मयोग का साक्षात उदाहरण है हरेली। मनुष्य केवल प्रकृति का उपभोग न करे, बल्कि उसके साधनों (औजारों) और सह-अस्तित्व वाले जीवों (पशुओं) के प्रति विनम्रता और कृतज्ञता का भाव रखे!
*छत्तीसगढ़ी लोक-कथा (जनश्रुति):*
*कथा का सार:* छत्तीसगढ़ के गांवों में एक किवदंती है कि सावन के महीने में जब चारों ओर हरियाली होती है, तो ‘धरती मैया’ (माता अन्नपूर्णा) अपनी संतान (मानव और पशु) को आशीष देने के लिए रूप बदल कर खेतों में आती हैं。
एक बार एक बूढ़े किसान ने अपने बीमार बैल को अकेला छोड़ दिया था। हरेली के दिन जब पूरा गांव औजारों और पशुओं की सेवा कर रहा था, तब उस किसान के सपने में आकर ठाकुरदेव (ग्राम देवता) ने कहा
“जेकर कोठार में बैल हांके, ओकर घर में लक्ष्मी बास करथे। पशु मन के सेवा ही असली पूजा आय।” (जिसके कोठार में बैल काम करते हैं, उसके घर लक्ष्मी जी का वास होता है)।
अगले दिन सुबह उठकर किसान ने बैल को औषधियुक्त लोँदी खिलाई और बैल चमत्कारिक रूप से ठीक हो गया। तब से यह परंपरा और गहरी हो गई।
*उत्तराखंड (हरेला):* कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में इसे ‘हरेला’ (हरियाली का दिन) के रूप में मनाते हैं। लोग सात या नौ प्रकार के अनाजों के बीज बोते हैं और नई फसल की हरियाली का स्वागत करते हैं।
*राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश (हरियाली अमावस्या):*
इसे भगवान शिव और मां पार्वती की आराधना, पितृ-तर्पण तथा विशेष रूप से वृक्षारोपण (पौधे लगाने) के महा-संकल्प के रूप में मनाया जाता है।
*हिमाचल प्रदेश (रिह्याली/हरियाली):*
शिमला और कांगड़ा क्षेत्रों में इसे मानसून के आगमन और खेतों में नई रोपाई की सफलता के लिए मनाया जाता है।
*जनजातियों में हरेली पर्व का महत्व :*
जनजाति समाज में परंपरागत मान्यता है कि प्रकृति, जीव और समूचा मानव समुदाय: अमुस-जिरांग परंपराओं का बहुआयामी वैज्ञानिक व दार्शनिक विमर्श धरती का प्रथम ऋचा-पर्व: दोबेंग पोहलाना की वैद्य परंपरा और आधुनिक पर्यावरण चुनौतियों का समाधान हैं।
कुसीर पंडुम (हरेली) त्योहार प्रकृति, मानव और जीव-जंतुओं के बीच के उस अटूट सह-अस्तित्व का उत्सव है, जो आधुनिक दुनिया के लिए पर्यावरण संरक्षण और सतत जीवन का सबसे बड़ा आदर्श प्रस्तुत करता है।
छत्तीसगढ में जनजातीय समाज,गोंड़, संथाल ,उरांव, कंवर,बैगा मुरिया ,माड़िया, हल्बा, दोरला, कोया कुटुम्बा ,भतरा इत्यादि के व्दारा हरेली पर्व को मानने का एक अलग महत्व ,विशेषता और अनुष्ठान है जिसें गोंण्डी ,हल्बी, भतरा, उड़िया जैसें जनजातीय बोली में हरेली, हरियाली पर्व को कुसीर पंडुम, अमुस,जिरांग, दोबेंग पोहलाना,पर्व के रूप मनाते है ,प्रकृति के आधारित जीवन पध्दति और जीवन मूल्यो वाला पंडुम जों स्वास्थ्य वर्धक जड़ी बुटियों ,कोयोकंद, शतावरी, रसना आदि विशेष मिश्रण को एक साथ सभी बच्चों, व्यवस्क, बुजूर्गों व कोंदाल (बैल) जैसे पशुओ को एक साथ खिलाकर, दस्त, डायरिया,कमजोरी जैसे महामारियों को जड़ सें मिटाने का जागरूकता महाभियान की शुरुआत करते है।
इसी दिन बरसात के बाद उगी नयी वनस्पियों को तब तक नहीं खाते जब तक उनमें बैक्टीरिया की सान्द्रता कम ना हो जाय और परिपक्व होने के बाद उनकें औषधीय गुणों को आनें वाली पीढ़ियों को सिखानें व उसके संरक्षण, संवर्धन एवं प्रबंधन और परिचित करानें का पर्व, जैसे आमारी भाजी, झड़ी भाजी, चेच भाजी दोबांग आदि जैसे पत्तेदार सब्जियों को अपने कुल देवी-देवताओ, पूर्वजों ,ईस्ट देव ,ग्राम देवी-देवताओ को अर्पित कर खाना शुरू किया जाता है।
बरसाती कीड़ो-मकोड़े व जहरीले साँपों से बच्चों को बचाने भिमा लिगों व्दारा अविष्कारित पवित्रतम गों से गोण्ड़ोन्दी ,डिटोंग (गेड़ी)के रूप में जमीन से कई ऊपर चलने की तकनीक का उद्घाटन ।
फसलों को तनाछेदक व अन्य कीटों सें बचाने ,वृक्ष कोहका(भेलवा),नीम व ब्लैक शेडो जैसे किट भक्षी चिड़ियों को आकर्षित कर फसल प्रबंधन करने । पवित्रतम मड़दी (सहजा वृक्ष) की टहनी गाड़ने जैसा करने हजारों साल बाद भी उनकी पारंपरिक तकनीक आज के कृषि वैज्ञानिक अब भी सलाह लेते रहते हैं।
बच्चों को दिमागी रूप सें सजग और तंदुरुस्त स्वस्थ बनाने “कोर्र घड़ी”(मुर्गे का समय )के साथ समय सेट कर अपने अनुमस्तिष्क को विकसित करने के लिए लेसनी,पन बिच्छु से जहर इंजेक्ट करना या लहसुन की कली सें आंकना।
गोंडी शब्द सें पवित्रतम कोंदाल के कृषि योग्य बछड़े/बच्चे को हल चलाने की प्रथम पाठशाला का गुर सीखाना प्रारम्भ।
मानव सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वालें महान कोंदाल के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने का पर्व।
नमक आयोडीन की कमी जो दस्त व बरसात में आम हैं जिसका पारंपरिक इलाज नमक को डाँग कांदा के पत्तो के साथ खिलाना।
गोंडरी (बाड़ी)में उत्पादित फसलों में शाखाओ को तेजी से पल्लवित करने के लिए “हर्बल हार्मोंस उत्प्रेरकों एवं हर्बल कीटनाशकों” का एक साथ एक ही दिन और लगभग एक ही समय झिड़काव करने का प्राचीन पारंपरिक तकनीक को इस पर्व के दिन करते है!
छत्तीसगढ़ और उसके आसपास के जनजातीय अंचल में सावन मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला हरेली तिहार केवल एक लोक-पर्व नहीं, बल्कि आदिम संस्कृति का महा-अनुष्ठान है।
गोंड समाज इसे गोंडी में कुसीर पंडुम या अमुस (अमावस्या) तिहार कहते हैं।
दोरला और कोया कुटुम्बा में इसे जिरांग कहा जाता है।
मुरिया, माड़िया, हल्बा, उरांव, संथाल, भील, कंवर और भतरा समाजों में इसे दोबेंग पोहलाना या प्रकृति-आधारित जीवन पद्धति का आधार माना जाता है।
यह पर्व मुख्य रूप से ‘कुटकी
दाई’/ठाकुर दाई (अन्न की देवी) और बूढ़ादेव, ठाकुरदेव को समर्पित है, जो यह याद दिलाता है कि मानव जीवन का अस्तित्व पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर है।
*पर्व से जुड़ी किवदंतियाँ और आदर्श:*
जनजातीय समाज में यह मान्यता है कि कुटकी दाई/ठाकुर दाई धरती पर बिखरे हरी घास और फसलों के पौधों में वास करती हैं। इस दिन खेतों में पैर रखना वर्जित माना जाता है क्योंकि “धरती माता अभी गर्भस्थ शिशु (धान के अंकुर) को पाल रही हैं।” यह आदर और संवेदनशीलता जनजातीय दर्शन की सर्वोच्च ऊंचाई को दर्शाती है। इस दिन भेलवा और नीम की पत्तियां दरवाजे पर लगाई जाती हैं और लोहार द्वारा घरों के मुख्य द्वार पर कील ठोकी जाती है। इसके पीछे यह किवदंती है कि यह तकनीक बुरी शक्तियों (संक्रमण और नकारात्मक ऊर्जा) को घर में प्रवेश करने से रोकती है।
*बहुआयामी महत्व और निहितार्थ (वैज्ञानिक से आर्थिक तक):*
जनजातीय परंपरा का रूप (कुसीर पंडुम) वर्तमान और भविष्य के लिए इसका निहितार्थ
वैज्ञानिक एवं औषधीय नीम और भेलवा की शाखाओं को खेतों और घरों में रोपना। नीम एक प्राकृतिक कीटनाशक और एंटी-बैक्टीरियल है। सावन में कीट-पतंगों से फसलों और मानव स्वास्थ्य की रक्षा करने का यह शुद्ध वैज्ञानिक तरीका है।
चिकित्सीय व वैद्य परंपरा पशुओं को नमक और कडू-कुटकी की जड़ी-बूटियां खिलाना। यह पारंपरिक पशु-चिकित्सा का हिस्सा है, जो मानसून के समय होने वाले खुरपका-मुंहपका रोगों से मवेशियों को बचाता है।
मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक गेड़ी नृत्य (बांस की लाठियों पर चलना) और नारियल फेंक प्रतियोगिता। बाढ़ और कीचड़ के दिनों में शारीरिक संतुलन, अवसाद मुक्ति, और सामूहिक खेलों के माध्यम से सामाजिक समरसता व मानसिक स्फूर्ति का संचार।
दार्शनिक व आध्यात्मिक कृषि औजारों (नांगर, गैंती, कुदाली) और पशुओं की पूजा। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘सर्वभूतहिते रतः’ का जीवंत दर्शन। मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक छोटा सा हिस्सा मानता है।
आर्थिक स्वावलंबन स्थानीय संसाधनों (बांस, नीम, मिट्टी, महुआ) का उपयोग। बाजार पर निर्भरता खत्म कर स्थानीय स्तर पर आर्थिक स्वावलंबन और संसाधनों के चक्रण का पाठ पढ़ाता है।
मानवशास्त्रीय व पुरातात्विक माटी पूजन और प्राचीन औजारों का सम्मान। यह पर्व लौह युग और कृषि क्रांति के समय से मानव विकास और प्रकृति के सह-संबंधों का जीवित इतिहास है।
भारत में यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा बहुआयामी विज्ञान काम करता है:
दृष्टिकोण निहितार्थ और व्यावहारिक उदाहरण
वैज्ञानिक एवं औषधीय श्रावण मास में मानसून के कारण रोगाणु बढ़ते हैं। इस दिन घरों के मुख्य द्वार पर नीम और भेलवा की पत्तियां लगाई जाती हैं। नीम प्राकृतिक कीटनाशक और एंटी-बैक्टीरियल है, जो बारिश में फैलने वाली बीमारियों से बचाता है।
चिकित्सीय (आयुर्वेद) आयुर्वेद के अनुसार श्रावण में वायुमंडल में वात दोष बढ़ जाता है, जिससे पाचन अग्नि मंद हो जाती है। इस दिन व्रत रखने (सात्विक आहार लेने) और प्रकृति के सानिध्य में रहने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता है।
दार्शनिक एवं आध्यात्मिक यह पर्व ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (समग्र ब्रह्मांड एक परिवार है) और सर्वधर्म समभाव का प्रतीक है। मनुष्य, पशुधन और वनस्पतियों को एक ही चेतना के सूत्र में पिरोकर देखना ही इस पर्व का दर्शन है।
आर्थिक स्वावलंबन कृषि उपकरणों को साफ कर, तेल-सिंदूर लगाकर पूजा करना यह सिखाता है कि जो संसाधन हमारी आजीविका के साधन हैं, उनका सम्मान आवश्यक है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्वदेशी आत्मनिर्भरता को बल देता है।
मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक छत्तीसगढ़ में इस दिन बच्चे और युवा गेड़ी (बांस की लकड़ी के ऊंचे पैर) पर चढ़कर दौड़ लगाते हैं और संतुलन का खेल खेलते हैं। यह प्रतियोगिता सामाजिक समरसता, बंधुत्व और मानसिक अवसाद को दूर कर उत्साह का संचार करती है।
मानवशास्त्रीय एवं पुरातात्विक जनजातीय समाज (जैसे बस्तर के आदिवासी) इस दिन ‘पाट जात्रा’ अनुष्ठान करते हैं, जो प्राचीन काल से प्रकृति और मनुष्य के सह-अस्तित्व के इतिहास को दर्शाता है।
*वैदिक ग्रंथों और पुराणों से (वृक्ष का महत्व);*
मत्स्य पुराण और ऋषियों के वचनों के अनुसार एक वृक्ष को दस पुत्रों के समान माना गया है:
*”दस कूप समा वापी, दस वापी समो ह्रदः।*
*दस ह्रद समो पुत्रः, दस पुत्र समो द्रुमः॥”*
(अर्थ: दस कुओं के बराबर एक बावड़ी होती है, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है।)
श्रीमद्भगवद्गीता से (प्रकृति चक्र):
भगवान कृष्ण ने गीता के तीसरे अध्याय में कहा है कि संपूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है:
“अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥”
वर्तमान चुनौतियाँ और समाधान:
आज का वैश्विक समाज जलवायु परिवर्तन , मिट्टी की घटती उर्वरता और मानसिक अवसाद जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। हरेली पर्व इन आधुनिक समस्याओं का सीधा और सरल समाधान प्रस्तुत करती है:
मशीनीकरण बनाम प्रकृति का सम्मान:
आज हम मशीनों का दोहन करते हैं, लेकिन सनातन समाज मशीनों (कृषि उपकरणों) को आराम देकर उनकी पूजा करता है, जो कृतज्ञता का पाठ पढ़ाता है।
रासायनिक खेती का विकल्प: हरेली की भेलवा और नीम आधारित परंपरा यह सिखाती है कि रासायनिक दवाओं के बिना भी फसलों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
*पर्यावरण संरक्षण:*
इस पर्व का मूल नियम है कि प्रकृति से उतना ही लो, जितना आवश्यक हो।
पीढ़ी दर पीढ़ी इस परंपरा को बनाए रखना क्यों आवश्यक है? (भविष्य के लिए आदर्श)
आने वाली पीढ़ी के लिए इस पर्व को जानना और मानना इसलिए अनिवार्य है क्योंकि:
यह “इको-सेंट्रिक” (प्रकृति-केंद्रित) जीवन जीना सिखाता है, न कि “एंथ्रोपो-सेंट्रिक” (मानव-केंद्रित)
भविष्य की पीढ़ियों को यदि ग्लोबल वार्मिंग से बचना है, तो उन्हें सनातन के इस हरियाली पर्व के दर्शन को समझना होगा, जहाँ पेड़-पौधों, गाय-बैल, और औजारों को भी परिवार का सदस्य माना जाता है।
हरेली भारत के सनातन समाज द्वारा सदियों से सहेजा गया एक ऐसा अमूल्य धरोहर-दर्शन है, जो मनुष्य को सर्वशक्तिमान होने के अहंकार से मुक्त कर प्रकृति का एक छोटा सा हिस्सा मात्र होने का अहसास कराता है। यह पर्व वैज्ञानिक सूझबूझ, जन-स्वास्थ्य (वैद्य परंपरा), मानसिक उल्लास और सामाजिक एकता का ऐसा ताना-बाना है, जिसकी प्रासंगिकता समय के साथ घट नहीं रही, बल्कि वैश्विक पर्यावरण संकट के इस दौर में और अधिक बढ़ गई है।
यदि आधुनिक समाज को सतत विकास के सही मायने सीखने हैं, तो उसे भारत के जंगलों में बजने वाले मांदड़ की थाप और हरियाली पर्व के इस आदिम, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सौंदर्य को आत्मसात करना होगा। यही वर्तमान का सुरक्षा कवच है और भविष्य का सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक दर्शन भी।वर्तमान की आधुनिक और यांत्रिक दुनिया में कंक्रीट के जंगलों के बीच हरियाली पर्व का महत्व और अधिक बढ़ गया है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि हमारा अस्तित्व “स्वदेशी” साधनों, हमारे पशुधन और इस हरी-भरी वसुंधरा पर ही टिका है। भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए इस समृद्ध विरासत को केवल जानना ही नहीं, बल्कि प्रत्येक पीढ़ी के व्यवहार में उतारना अनिवार्य है।
विकेश कुमार हिचामी
प्रदेश संयोजक नीति एवं अनुसंधान विभाग अनुसूचित जनजाति मोर्चा भाजपा छत्तीसगढ
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