CG — स्कूलों में धार्मिक प्रार्थनाएं अनिवार्य करने के आदेश के खिलाफ आदिवासी समाज का प्रदर्शन, राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन
स्कूल शिक्षा का केंद्र हैं, धर्म प्रचार का नहीं’— धार्मिक गतिविधियों के आदेश के खिलाफ आदिवासी समाज का विरोध


कांकेर/ चारामा 22 जून 2026:— सरकारी स्कूलों में प्रार्थना के दौरान सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और शांति मंत्र जैसी धार्मिक गतिविधियों को शामिल करने के आदेश का विरोध अब तेज होने लगा है। सोमवार को अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति संयुक्त मोर्चा, ब्लॉक चारामा के नेतृत्व में आदिवासी समाज, सामाजिक संगठनों, युवाओं और कर्मचारियों के प्रतिनिधियों ने चारामा एसडीएम को ज्ञापन सौंपकर आदेश को वापस लेने की मांग की।
ज्ञापन में कहा गया है कि स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा 12 जून 2026 को जारी आदेश में शासकीय और अशासकीय विद्यालयों में कुछ धार्मिक मंत्रों, प्रार्थनाओं और भजनों को शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं। समाज के लोगों का कहना है कि छत्तीसगढ़ एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक राज्य है, जहां विभिन्न समुदायों की अपनी अलग धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं। ऐसे में किसी एक धर्म विशेष से जुड़ी गतिविधियों को विद्यालयों में अनिवार्य करना संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के अनुरूप नहीं है।
गोंड़वाना समाज समन्वय समिति के संरक्षक विजय ठाकुर ने कहा कि शासन के आदेश में शामिल कई प्रार्थनाएं, भजन और गीत एक विशेष धर्म से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि संविधान सभी धर्मों को समान सम्मान देने की बात करता है, इसलिए शैक्षणिक संस्थानों में किसी एक धर्म विशेष की गतिविधियों को अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि इसी मांग को लेकर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति संयुक्त मोर्चा के नेतृत्व में राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा गया है।
वहीं वरिष्ठ आदिवासी नेता एवं जनपद उपाध्यक्ष ठाकुर राम कश्यप ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को बेहतर ज्ञान देना है, न कि उन पर अतिरिक्त मानसिक बोझ डालना। उन्होंने कहा कि विद्यालयों में पहले से ही पढ़ाई और अन्य गतिविधियों का दबाव रहता है, ऐसे में अतिरिक्त मंत्रों और धार्मिक गतिविधियों को अनिवार्य करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था संविधान और कानून के अनुसार संचालित होनी चाहिए तथा बच्चों को उनकी जरूरत और अभिभावकों की अपेक्षाओं के अनुरूप शिक्षा मिलनी चाहिए। उन्होंने सरकार से आदेश पर पुनर्विचार करने की मांग की।
समाज के प्रतिनिधियों ने अपने ज्ञापन में संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी नागरिकों को समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और अपनी संस्कृति को संरक्षित रखने का अधिकार प्राप्त है। आदिवासी समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान भी संविधान द्वारा संरक्षित है। इसलिए किसी भी ऐसे आदेश को वापस लिया जाना चाहिए जिससे किसी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान प्रभावित होती हो।
ज्ञापन में शासन से मांग की गई है कि 12 जून 2026 को जारी आदेश को तत्काल निरस्त किया जाए। साथ ही विद्यालयों में प्रार्थना और नैतिक शिक्षा कार्यक्रमों को संविधान, लोकतंत्र, समानता, वैज्ञानिक सोच, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय मूल्यों पर आधारित बनाया जाए। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्थानीय भाषा, संस्कृति, इतिहास और पारंपरिक ज्ञान को भी उचित स्थान देने की मांग की गई।
प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि यदि आदेश वापस नहीं लिया गया तो समाज और संयुक्त संगठन संवैधानिक एवं कानूनी विकल्पों का सहारा लेने के लिए बाध्य होंगे। ज्ञापन सौंपने के दौरान बड़ी संख्या में समाज के पदाधिकारी, युवा प्रतिनिधि और विभिन्न संगठनों के सदस्य उपस्थित रहे।
इस दौरान ठाकुर राम कश्यप वरिष्ठ आदिवासी नेता व जनपद उपाध्यक्ष चारामा,गौतम कुंजम अध्यक्ष सर्व आदिवासी समाज, विजय ठाकुर संरक्षक गोंडवाना समन्वय समिति, रमेश कुमार मौर्य अध्यक्ष सतनामी समाज,भाव सिंह केसरी जिला अध्यक्ष युवा प्रकोष्ठ सतनामी समाज कांकेर, अश्वन कुंजम अध्यक्ष युवा प्रकोष्ठ गोंडवाना समाज, राज कपूर बारसागड़े प्रमुख बौद्ध समाज,, कोमल मेश्राम उपाध्यक्ष बौद्ध समाज,, आत्मा मौर्य सचिव जिला सतनामी समाज कांकेर सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित रहे।



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