CG — राष्ट्रपति भवन में गूंजी बस्तर की सांस्कृतिक पहचान,,जगरगुंडा के धुरवा नृत्य दल ने बढ़ाया पूरे संभाग का मान,,दिल्ली से लौटे 209 प्रतिभागियों का चारामा में भव्य स्वागत,,माँझी-मुखिया व्यवस्था, संवैधानिक अधिकार और जनजातीय अस्मिता पर हुआ संवाद


कांकेर 2 अगस्त 2026:— बस्तर संभाग के सातों जिलों के लिए यह ऐतिहासिक और अत्यंत गौरव का क्षण है। संभाग स्तरीय बस्तर पंडुम, जगदलपुर में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले सुकमा जिले के जगरगुंडा के धुरवा नृत्य दल सहित संभाग के 209 प्रतिभागियों ने देश के सर्वोच्च सदन राष्ट्रपति भवन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस दल में विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभाशाली युवाओं के साथ समाज के मार्गदर्शक माँझी-मुखिया भी शामिल थे।
दिल्ली से लौटने के दौरान कांकेर जिले की गोंडवाना समाज समन्वय समिति के जिला उपाध्यक्ष शिव तुमरेटी के नेतृत्व में इन आदिवासी कलाकारों का भव्य स्वागत किया गया। ब्लॉक चारामा के झिपाटोला, खैरखेड़ा और लखनपुरी स्थित शिव तुमरेटी तथा ब्लॉक संरक्षक विष्णु जुर्री के निवास पर सुकमा जिले के धुरवा नृत्य दल के प्रतिभागियों, माँझी-मुखिया, सामाजिक पदाधिकारियों और नोडल अधिकारियों का आत्मीय सत्कार किया गया।
अस्मिता, अस्तित्व और नीतिगत संवाद :- इस मिलन समारोह में केवल पारंपरिक रीति-रिवाजों से स्वागत ही नहीं हुआ, बल्कि जनजातीय समाज की अस्मिता और अस्तित्व आधारित विकास पर गंभीर वैचारिक संवाद भी हुआ। समाज के प्रबुद्धजनों ने आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों, जनजातीय रीति-रिवाजों, परंपराओं तथा रूढ़िगत प्रथाओं (Customary Laws) के संरक्षण पर विस्तार से चर्चा की।
केंद्रीय नेतृत्व की सोच: वर्तमान राष्ट्रपति और गृह मंत्री का दृष्टिकोण:- संवाद के दौरान इस बात पर विशेष प्रकाश डाला गया कि देश का वर्तमान केंद्रीय नेतृत्व जनजातीय समाज को लेकर किस प्रकार की सोच रखता है।
महामहिम राष्ट्रपति का दृष्टिकोण:- देश की प्रथम आदिवासी महिला राष्ट्रपति के रूप में उनका इस पद पर आसीन होना स्वयं में जनजातीय अस्मिता की बड़ी उपलब्धि माना गया। उनका मानना है कि विकास की अंधी दौड़ में आदिवासियों की जल, जंगल और जमीन से जुड़ी रूढ़िगत परंपराएँ तथा सांस्कृतिक पहचान समाप्त नहीं होनी चाहिए। राष्ट्रपति भवन के द्वार बस्तर के सुदूर जगरगुंडा के आदिवासियों के लिए खुलना इस बात का प्रतीक है कि अंतिम छोर पर रहने वाला व्यक्ति भी देश के केंद्र में है।
केंद्रीय गृह मंत्री का दृष्टिकोण:-केंद्रीय गृह मंत्री का दृष्टिकोण बस्तर जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ-साथ ‘अस्तित्वपरक विकास’ (Identity-based Development) पर आधारित है। सरकार की नीति सुदूर क्षेत्रों, जैसे जगरगुंडा, में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ पहुँचाने के साथ-साथ पाँचवीं अनुसूची के अधिकारों और स्थानीय जनजातीय नेतृत्व (माँझी-मुखिया व्यवस्था) को सशक्त बनाने की है, ताकि नक्सलवाद के प्रभाव को समाप्त करते हुए पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को सुरक्षित रखा जा सके।
यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि बस्तर का आदिवासी समाज अब अपनी सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर गौरवान्वित करने के साथ-साथ अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति भी पूरी तरह सजग और जागरूक हो चुका है।
पारंपरिक ताने-बाने का सम्मान: माँझी-मुखिया प्रथा :- इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता माँझी-मुखिया समाज की सक्रिय भागीदारी रही। बस्तर में पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था (Traditional Governance) के अंतर्गत माँझी-मुखिया का पद अत्यंत सम्मानित माना जाता है। कांकेर जिले के चारामा क्षेत्र के झिपाटोला, खैरखेड़ा और लखनपुरी में शिव तुमरेटी तथा विष्णु जुर्री के परिवारों द्वारा किया गया स्वागत यह दर्शाता है कि आदिवासी समाज भौगोलिक दूरियों से परे अपनी रूढ़िगत व्यवस्था और आपसी भाईचारे के सूत्र में एकजुट है।
संवैधानिक अधिकार और रूढ़िगत प्रथाएँ:- संवाद का मुख्य विषय जनजातीय समाज के संवैधानिक अधिकार, जैसे पाँचवीं अनुसूची और पेसा कानून (PESA Act), तथा रूढ़िगत प्रथाएँ रहीं। भारतीय संविधान आदिवासियों को अपनी विशिष्ट संस्कृति और पारंपरिक परंपराओं को सुरक्षित रखने का अधिकार देता है। चर्चा में यह बात उभरकर सामने आई कि वास्तविक विकास वही है, जो आदिवासी समाज को उसकी जड़ों से जोड़े रखते हुए शिक्षा और आधुनिक अवसरों से भी जोड़ सके।
वर्तमान केंद्रीय नेतृत्व का नजरिया और आदिवासी नीति:-वर्तमान राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति का भी विश्लेषण किया गया। राष्ट्रपति का विजन: राष्ट्रपति का मानना है कि जनजातीय कला और जीवनशैली पर्यावरण संरक्षण की सर्वोत्तम मिसाल हैं। बस्तर के धुरवा नृत्य को दिल्ली में मिला सम्मान इस बात का संकेत है कि देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान को सम्मान देता है।
गृह मंत्री की रणनीति: देश के नीति-निर्माताओं और गृह मंत्रालय की सोच अब बस्तर को लेकर केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि विकास और संवाद पर भी केंद्रित है। जगरगुंडा जैसे कभी अति संवेदनशील रहे क्षेत्रों के युवाओं का कला के माध्यम से आगे आना यह दर्शाता है कि शासन स्थानीय परंपराओं के साथ विकास को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।
सुकमा के धुरवा नर्तकों की थिरकन जब राष्ट्रपति भवन से लेकर कांकेर के झिपाटोला गाँव तक गूँजती है, तो यह विश्वास जगाती है कि आदिवासी समाज का भविष्य सुरक्षित है। यह यात्रा संदेश देती है कि आधुनिक भारत में बस्तर का विकास उसकी अस्मिता की कीमत पर नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और संवैधानिक मजबूती के साथ होगा।
इस स्वागत-अभिनंदन कार्यक्रम में नोडल अधिकारी, गोंडवाना समाज समन्वय समिति के संभागीय उपाध्यक्ष कोमल मरकाम, विकेश हिचामी (प्रदेश संयोजक, नीति एवं अनुसंधान विभाग, अनुसूचित जनजातीय मोर्चा) तथा उनके परिवारजन उपस्थित थे।
Live Cricket Info







