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CG : तेजी से बढ़ रहा औषधीय पौधों की खेती,ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहे किसान और समूह की महिलाएं,दिल्ली से पहुंचे टीम ने बच,खस, सिंदूर, ब्राम्ही और सतावरी के बारे में जाना…!!

CG : तेजी से बढ़ रहा औषधीय पौधों की खेती,ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहे किसान और समूह की महिलाएं,दिल्ली से पहुंचे टीम ने बच,खस, सिंदूर, ब्राम्ही और सतावरी के बारे में जाना...!!

धमतरी,29 अप्रैल 2026।छत्तीसगढ़ में जहां नज़र घुमाओ,वहां लहलहाते धान के खेत दिख जाते हैं।धान सिर्फ इस प्रदेश की पहचान ही नहीं, बल्कि यहां की परंपरा और संस्कृति की आत्मा है, जिसके अपने अलग मायने है,इसी वजह से छत्तीसगढ़ को “धान का कटोरा” भी कहा जाता है।लेकिन अब वक्त के साथ यहां की खेती भी बदल रही है।

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धान के साथ-साथ अब किसान औषधीय पौधों की खेती की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं,और यही बदलाव छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दे रहा है।

*दौरा और पहल…*

औषधि पादप बोर्ड के सलाहकार एफ. आर. कोसरिया के नेतृत्व में एक विशेष दौरा आयोजित किया गया। इस दौरान दिल्ली, रायपुर और धमतरी के वरिष्ठ पत्रकारों को धमतरी जिले के विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण कराया।

*मंदरौद गांव में खस और सिंदूर की खेती..*

दौरे की शुरुआत कुरुद क्षेत्र के महानदी किनारे बसे मंदरौद गांव से हुई,जहां किसानों और महिला स्व सहायता समूहों द्वारा खस और सिंदूर की खेती की जा रही है।यहां न सिर्फ खेती हो रही है, बल्कि महिलाएं आत्मनिर्भर बनने की दिशा में मजबूत कदम उठा रही हैं।

*कंडेल, कोलियारी और करेठा विभिन्न औषधीय फसलें…*

इसके बाद टीम पहुंची कंडेल गांव, जहां ब्राह्मी की खेती का अवलोकन किया गया,फिर कोलियारी और करेठा में सतावरी जैसी महत्वपूर्ण औषधीय फसलों का निरीक्षण किया गया।ये पौधे आयुर्वेद में बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं और बाजार में इनकी मांग लगातार बढ़ रही है।

*राऊतमुड़ा में बच की खेती का प्रयोग…*

वहीं मगरलोड वनांचल क्षेत्र के राऊतमुड़ा में प्रयोग के तौर पर किसानों द्वारा बच खेती की जा रही है, जहां दौरे का एक अहम पड़ाव रहा,जहां किसानों ने पहली बार “बच” (औषधीय पौधा) की खेती शुरू की है,करीब 6 किसानों ने मिलकर 5 एकड़ में इसकी खेती कर रहे हैं।

किसानों के मुताबिक इसमें पानी की खपत कम होती है,लागत कम लगती है, हालांकि फसल तैयार होने में 7 से 8 महीने का समय लगता है,लेकिन मुनाफा अच्छा मिलने की उम्मीद है

किसानों ने यह भी बताया कि उन्हें औषधि पादप बोर्ड द्वारा महासमुंद में प्रशिक्षण दिया गया था, जिससे उन्हें इस खेती की पूरी जानकारी मिली।

वहीं औषधि पादप बोर्ड के सलाहकार एफ. आर. कोसरिया ने बताया कि।

किसानों को निशुल्क बीज और पौधे उपलब्ध कराए जाते हैं।

कम लागत में अधिक लाभ संभव है।

फसल तैयार होने के बाद एनजीओ के माध्यम से बोर्ड खुद खरीदी सुनिश्चित करता है।

इससे किसानों को बाजार की चिंता नहीं रहती और वे निश्चिंत होकर खेती कर सकते हैं।

गौरतलब है कि आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में आगे बढ़ते हुए धमतरी जिले के कई क्षेत्रों में किसान और महिला समूह अब औषधीय खेती अपना रहे हैं।

यह न सिर्फ उनकी आय बढ़ा रहा है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भी बना रहा है।

*पचमेड़ी – मॉडल प्लांट के रूप में उभरता केंद्र..*

भाखरा क्षेत्र के पचमेड़ी में औषधीय पौधों का एक मॉडल फार्म तैयार किया गया है,जहां आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक तरीके से खेती की जा रही है, जहां मॉडल फार्म किसानों के लिए प्रशिक्षण केंद्र के रूप में काम कर रहा है साथ ही 

नई तकनीकों को समझने का अवसर दे रहा है,और भविष्य में औषधीय खेती का हब बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़, धान के कटोरे से आगे बढ़कर औषधीय खेती की नई पहचान गढ़ रहा है,जहां किसान आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहे हैं,अगर यही रफ्तार बनी रही,तो आने वाले समय में छत्तीसगढ़, देश में औषधीय खेती का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।

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