CG — कांकेर में रियासतकालीन मेला धूमधाम से प्रारंभ, 200 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन

कांकेर 4 जनवरी 2025:-रियासतकालीन परंपरा से जुड़ा ऐतिहासिक मेला कांकेर में धूमधाम और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ प्रारंभ हुआ। इस मेले की शुरुआत सन् 1853 में कांकेर रियासत के राजा नरहरदेव द्वारा की गई थी। तब से यह मेला निरंतर आयोजित किया जा रहा है। मेले में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है और देश-विदेश से आने वाले सैलानी इस पारंपरिक आयोजन के साक्षी बनते हैं।
धूमधाम से हुई मेले की शुरुआत
मेले के शुभारंभ अवसर पर सांसद भोजराज नाग भी उपस्थित रहे। इस दौरान उन पर देवी की आराधना का भाव जाग्रत हुआ। सांसद नाग ने कहा कि बस्तर अंचल में देवी-देवताओं के साथ मेले की शुरुआत करना एक प्राचीन परंपरा है और वही परंपरा आज भी निभाई जा रही है। राजमहल से देवी-देवताओं के साथ शोभायात्रा निकलकर मेलाभाठा मैदान पहुंची। यहाँ परंपरानुसार खंभे की परिक्रमा कर मेले की विधिवत शुरुआत की गई। राजकुमार आदित्य प्रताप देव के निर्देशन में पूरे आयोजन का संचालन किया गया।
राजमहल पहुँचे सभी देवी-देवता:-राजकुमार आदित्य प्रताप देव ने बताया कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी विभिन्न ग्रामों के देवी-देवता राजमहल में एकत्र हुए। उनका विधिवत स्वागत करने के बाद उन्हें मेला स्थल ले जाया गया, जहाँ क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली के लिए प्रार्थना की गई।
देश-विदेश से आते हैं सैलानी
कांकेर का यह मेला केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश-विदेश के पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। पर्यटकों के ठहरने की व्यवस्था राजमहल के कॉटेजों में की जाती है। इस वर्ष भी विदेशी सैलानियों ने बस्तर की परंपरा, लोकसंस्कृति और त्यौहारों को देखकर गहरी प्रसन्नता व्यक्त की।
200 साल से भी पुराना इतिहास
कांकेर मेला 200 वर्ष से अधिक पुराना माना जाता है। राजा नरहरदेव के शासनकाल (1853–1903) में इसकी शुरुआत हुई। तब से टिकरापारा मैदान को ही मेलाभाठा कहा जाता है। फसल कटाई के बाद, वर्ष के पहले रविवार को यह मेला आयोजित किया जाता है। किसान अपनी उपज बेचकर मेले में खरीदारी करते हैं और उत्सव का आनंद लेते हैं।
इस मेले में कांकेर शहर की सात शीतला माताओं सहित सैकड़ों देवी-देवताओं की उपस्थिति रहती है। भंडारीपारा, शीतलापारा, माहुरबंदपारा, टिकरापारा और अन्नपूर्णापारा के लोग मोखला मांझी का ध्वज और आंगादेव लेकर राजमहल पहुँचते हैं और परंपरा का निर्वहन करते हैं।
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